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      Patna High Court Ajeet Kumar vs The State Of Bihar on 14 August, 2024 Author: Partha Sarthy Bench: Partha Sarthy           IN THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT PATNA                   CRIMINAL MISCELLANEOUS No.66151 of 2023      Arising Out of PS. Case No.-791 Year-2015 Thana- AURANGABAD COMPLAINT CASE                                       District- Aurangabad      ====================================================== 1.    AJEET KUMAR SON OF VIJAY PRASAD @ PARMESHWAR SINGH 2.   PAPPU KUMAR SON OF VIJAY PRASAD @ PARMESHWR SINGH      BOTH   RESIDENTS      OF    VILLAGE-   NARAYANPUR, P.O.-      KAPSIYAWAN, P.S.- HILSA, DISTRICT- NALANDA             ...

अवयस्क की संविदा का प्रभाव (Effect of contract with minor)

    भारतीय व्यस्कता अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, अवयस्क वह व्यक्ति होता है जो 18 वर्ष से कम आयु का है।

  अवयस्क की संविदा की प्रकृति
        धारा 11 भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार, हर ऐसा व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम है जो उस विधि के अनुसार जिसके वह अध्यधीन है, प्राप्तवय हो, और जो  स्वस्थ चित हो, और किसी विधि द्वारा जिसके वह अध्यधीन है, संविदा करने से निरार्हित न हो।

  अवयस्क की संविदा आरम्भ से ही शून्य होती या शून्यकरणीय इस पर सदैव से मतभेद रहा है। परन्तु मोहरी बीबी  बनाम  धर्मदास घोष (1903) के वाद में प्रिवी कौंसिल ने इस मतभेद को समाप्त कर दिया और अभिनिश्चित किया कि अवयस्क की संविदा आरम्भ से ही शून्य होती है।
          धर्मदास जो अवयस्क था। उसने कलकत्ता के एक महाजन ब्रहम्दत्त से 10,500 रुपये बन्धक विलेख लिखकर लिए थे। बन्धक विलेख लिखे जाने के समय ब्रहम्दत्त के एजेंट को धर्मदास की अवयस्कता के बारे मे जानकारी मिल गई थी। परन्तु इसके बावजूद विलेख लिखवा लिया गया था। अवयस्क की ओर से उसकी माँ ने वाद किया कि बन्धक विलेख रद्द कर दिया जाये, क्योंकि वह अवयस्क द्वारा निष्पादित किया गया था। वाद के दौरान ब्रहम्दत्त मर गया और उसका स्थान उहकी पत्नी मोहरी बीबी ने प्राप्त कर वाद जारी रखा। अभिनिर्धारित हुआ कि अवयस्क द्वारा की गई संविदा आरम्भ से ही शून्य होती है।

   प्रत्यास्थापन का सिद्धांत
      लाहौर उच्च न्यायालय ने  खानगुल  बनाम  लक्खा सिंह  के वाद में अभिनिश्चित किया था कि प्रत्यवस्थापन का सिद्धांत अवयस्क की संविदा पर लागू होगा।
    परन्तु इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अयोध्या प्रसाद  बनाम  चन्दन लाल अ आई आरा 1937 इला के वाद में लाहौर उच्च न्यायालय के निर्णय को लागू करने से इनकार कर दिया।
   
    अनुसमर्थन
             अवयस्क द्वारा की गई संविदा का अनुसमर्थन नहीं किया जा सकता ।परन्तु वयस्कता में भी कुछ धन प्राप्त करके अवयस्कता के करार का अनुसमर्थन किया गया है तो अवयस्कता में किये गये करार को लागू कराया जा सकता है।

   परन्तु धारा 68 भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार यदि ऐसे व्यक्ति को, जो संविदा करने में असमर्थ है या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसका पालन पोषण करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध हो जीवन में उसकी स्थिति के योग्य आवश्यक वस्तुएं किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रदाय की जाती हैं तो वह अन्य व्यक्ति, ऐसे असमर्थ व्यक्ति की संपत्ति से भरपाई का हकदार है।

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