Court Cannot Issue Process U/S 82 Or 83 CrPC Without Recording Satisfaction That Persons Were Deliberately Avoiding Service: Patna HC Reiterates https://www.livelaw.in/high-court/patna-high-court/patna-high-court-court-proclamation-property-attachment-section-82-83-crpc-

      Patna High Court Ajeet Kumar vs The State Of Bihar on 14 August, 2024 Author: Partha Sarthy Bench: Partha Sarthy           IN THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT PATNA                   CRIMINAL MISCELLANEOUS No.66151 of 2023      Arising Out of PS. Case No.-791 Year-2015 Thana- AURANGABAD COMPLAINT CASE                                       District- Aurangabad      ====================================================== 1.    AJEET KUMAR SON OF VIJAY PRASAD @ PARMESHWAR SINGH 2.   PAPPU KUMAR SON OF VIJAY PRASAD @ PARMESHWR SINGH      BOTH   RESIDENTS      OF    VILLAGE-   NARAYANPUR, P.O.-      KAPSIYAWAN, P.S.- HILSA, DISTRICT- NALANDA             ...

प्रोटेस्ट पीटिशन में अपनाई जाने वाली प्रकिया /process followed in protest petition

उच्चतम न्यायलय ने विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सु कोर्ट 2019 के वाद में यह व्यवस्था की है कि
प्रोटेस्ट पीटिशन में कौन सी प्रकिया अपनायी जानी चाहिए ?
      न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसैफ की खण्ड पीठ ने यह मत व्यक्त किया कि प्रोटेस्ट पीटिशन को परिवाद के रूप में लेना चाहिए। यदि वह एक परिवाद की आवश्यकताऔं को पूर्ण करता है तो मजिस्ट्रेट  दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 200 एवं 202 की पालना कर सकता है। 

    बैंच ने यह भी कहा कि यदि मजिस्ट्रेट प्रोटेस्ट पीटिशन को परिवाद की तरह नहीं लेता तो परिवादी के लिए उपचार होगा कि वह एक नया परिवाद संस्थित करे। और मजिस्ट्रेट से दण्ड संहिता की धारा 200 एवं 202 की पालना करने की अपेक्षा करे। 

     उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर बहुत से निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्रोटेस्ट पीटिशन दायर करने का संहिता में कोई प्रावधान नहीं है परन्तु यह व्यवहार में है। 

   प्रोटेस्ट पीटिशन कोन दायर कर सकता है? 
         भगवन्त सिंह वाद ए आई आर 1985 सु कोर्ट 1285 के अनुसार यह अधिकार केवल सूचनादाता को है अन्य किसी को नहीं है। 
    अन्तिम आख्या प्राप्त होने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष विकल्प 
             जब पुलिस द्वारा धारा 173(2) दण्ड प्रकिया संहिता के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजी जाती है तो निम्न दशाएं उत्पन्न होती है। रिपोर्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किसी अपराध का कारित करना गठित कर सकती है। तब मजिस्ट्रेट 
  (1) उस रिपोर्ट पर संगान लेकर आदेशिका जारी कर सकता है। 
  (2) उस रिपोर्ट से असहमत हो सकता है और प्रकिया समाप्त कर सकता है। 
  (3) धारा 156(3) दण्ड प्रकिया संहिता के अंतर्गत पुलिस को पुनः अन्वेषण करने का आदेश दे सकता है। 
        दूसरी ओर जब पुलिस रिपोर्ट यह दर्शित करती है कि कोई अपराध गठित नहीं होता है तो मजिस्ट्रेट 

   (1) उस रिपोर्ट को स्वीकार कर प्रकिया समाप्त कर सकता है। 
  (2) रिपोर्ट से असहमत हो सकता है और कार्यवाही करने के लिए यदि पर्याप्त सामाग्री है तो उस पर संगान लेकर आदेशिका जारी कर सकता है। 
  (3) या पुनः अन्वेषण का आदेश दे सकता है। 
 स्थिति यह है कि यह सुस्थापित विधि है कि दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 173(2) के अंतर्गत रिपोर्ट प्राप्त होने पर भी मजिस्ट्रेट को अधिकार है कि दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 190(ख) के अंतर्गत संगान ले सकता है चारिपोर्ट किसी अपराध के गठित होने का खुलासा नहीं करती हो। मजिस्ट्रेट अन्वेषण में परिक्षित साक्षियों के 
साक्षियों के आधार पर संगान ले सकता है। 
  एसी स्थिति में मजिस्ट्रेट धारा 200 एवं 202 के प्रावधानों का अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं है। 

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