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जहां असंज्ञेय अपराध शामिल हैं, मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा दायर आरोप पत्र का संज्ञान नहीं ले सकते

 इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक निर्णय में कहा है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (डी) के अनुसार, जहां असंज्ञेय अपराध शामिल हैं, मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा दायर आरोप पत्र का संज्ञान नहीं ले सकते, इसके बजाय इसे शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सैयद आफताफ हुसैन रिजवी ने विमल दुबे और एक अन्य द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482  के अंतर्गत दायर याचिका को स्वीकार कर ये निर्णय दिया। आवेदकों के अधिवक्ता ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323 और 504 के अंतर्गत एक एनसीआर पंजीकृत किया गया था और उसके बाद जांच की गई और आवेदकों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया।  यह तर्क दिया गया कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट को देखे बिना और कानून के प्रावधानों के खिलाफ अपराध का संज्ञान लिया, क्योंकि धारा 2 (डी) सीआरपीसी के अनुसार, यदि जांच के बाद पुलिस रिपोर्ट में असंज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो यह शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए और जांच अधिकारी/पुलिस अधिकारी को शिकायतकर्ता माना जाएगा और शिकायत मामले की प्रक्रिया का पालन किया जाना है। धारा 2(डी) सीआरपीसी के प्रावध

maintenance of children is the liability of father

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी को तलाक देने की छूट दी,किंतु साथ ही कहा कि बच्चों के साथ तलाक नही हो सकता।सुप्रीम कोर्ट ने रत्न व आभूषण व्यापार से जुड़े मुंबई के रहने वाले इस व्यक्ति को 4 करोड़ रुपये की समझौता राशि जमा कराने के 6 सप्ताह का वक्त दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही भारतीय संविधान के आर्टिकल 142 के तहत मिली अपनी समग्र शक्तियों का प्रयोग करते हुए साल 2019 से अलग रह रहे दंपति के आपसी सहमति से तलाक पर मुहर लगा दी।इससे पूर्व जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ से सुनवाई के दौरान पति के पक्षकार अधिवक्ता ने कोरोना महामारी से व्यापार में नुकसान का हवाला देकर समझौता राशि देने के लिए कुछ और वक्त मांगा है। लेकिन पीठ ने कहा,आपने स्वम समझौते में सहमति दी है कि तलाक की डिक्री वाले दिन आप 4 करोड़ रुपये का भुगतान करेंगे।अब यह वित्तीय बाधा का तर्क देना सही नही होगा।समझौता वर्ष 2019 में हुआ था और उस वक्त कोरोना महामारी नही थी।पीठ ने कहा आप पत्नी को तलाक दे सकते है।लेकिन बच्चों से तलाक नही ले सकते,क्योंकि आपने उन्हें जन्म दिया है।आपको उनकी द

पारिवारिक मामलों में उच्च न्यायालय इलाहाबाद निर्णय किया है कि पत्नी की सुविधा स्थानांतरण का अच्छा आधार है।

 दिनांक 25/11/2021 को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि वैवाहिक मामलों में, पत्नी की सुविधा हस्तांतरण को सही ठहराने के लिए प्रमुख कारक है। अगर पत्नी के पास उसके परिवार में कोई नहीं है जो उसे अदालत पर ले जाए तो यह मुक़दमा स्थानांतरित करने के लिए अच्छा आधार है। न्यायमूर्ति विवेक वर्मा एक स्थानांतरण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें तलाक के मामले को प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, कानपुर नगर के न्यायालय से परिवार न्यायालय, प्रयागराज स्थानांतरित करने की मांग की गई थी (श्रीमती गरिमा त्रिपाठी बनाम सुयश ) पार्टियों का विवाह हिंदू रीति-रिवाज से हुआ। पति ने पत्नी-आवेदक के खिलाफ हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 के साथ पठित धारा 13(1)(ia) के तहत याचिका दायर की। पत्नी की ओर से तर्क दिया गया कि आवेदक एक युवा महिला होने के कारण जिला कानपुर की यात्रा नहीं कर सकती है, जो लगभग 200 किलोमीटर दूर है। प्रयागराज जिले से, कार्यवाही का बचाव करने के लिए कोई भी उसे ले जाने के लिए नहीं है क्योंकि वह प्रयागराज में अकेली रहती है। स्थानांतरण आवेदन का विरोध करने वाले पति के वकील ने प्रस्तुत किया कि

दूरस्थ शिक्षा प्रकार से अर्जित डिप्लोमा की तुलना रेगुलर प्रकार से किए गए डिप्लोमा से नहीं की जा सकती।

दिनांक 24/11/2021 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दूरस्थ शिक्षा प्रकार से अर्जित डिप्लोमा की तुलना रेगुलर प्रकार से किए गए डिप्लोमा से नहीं की जा सकती। जस्टिस कृष्ण मुरारी और एस अब्दुल नज़ीर की बेंच के अनुसार कोर्ट न तो निर्धारित योग्यता के दायरे का विस्तार कर सकती है और न ही यह अन्य योग्यताओं के लिए आवश्यक योग्यता की समानता तय कर सकती है। वर्तमान मामले में, हरियाणा के कर्मचारी चयन आयोग ने कला और शिल्प शिक्षकों के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे और योग्यता शिल्प और कला में डिप्लोमा होने की थी। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से डिप्लोमा प्राप्त करने वाले उम्मीदवार आवेदन करने के पात्र नहीं थे। इससे व्यथित, पार्टी ने उच्च न्यायालय का रुख किया जिसने फैसला सुनाया कि उम्मीदवार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से दूरस्थ मोड के माध्यम से प्राप्त डिप्लोमा के आधार पर पद के लिए आवेदन करने के पात्र थे।   उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध मामला उच्चतम न्यायालय  पहुंचा, तो उसने फैसला सुनाया कि उच्च न्यायालय गलत था और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा दिए गए डिप्लोमा को हरियाणा औद्योगिक प्रशिक्षण विभाग द्वार

मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय मामलों को सुनवाई के लिए सत्र न्यायाधीश को नहीं सौंपा जा सकता। cases trailable by magistrate can not be transferred to sessions court to hearing

बुधवार को, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए गठित विशेष अदालतों का अधिकार क्षेत्र, ऐसे मामलों में जो मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं, सत्र न्यायाधीश को नहीं सौंपा जा सकता है। बेंच के अनुसार, ऐसे मामलों को विशेष अदालतों को सौंपना सीआरपीसी और अन्य प्रासंगिक कानूनों के अनुसार किया जाना चाहिए यह आदेश अदालत द्वारा पारित किया गया था जब एक पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के एक आदेश का संदर्भ दिया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गलत व्याख्या की थी कि ऐसे मामलों की सुनवाई सत्र न्यायालय द्वारा की जानी है। अपने दिसंबर 2018 के आदेश में, शीर्ष अदालत ने कहा था कि सांसदों/विधायकों के खिलाफ मामले की सुनवाई के लिए एक सत्र और एक मजिस्ट्रियल को नामित करने के बजाय ऐसे मामलों को कई मजिस्ट्रियल और सत्र अदालतों को सौंपा जा सकता है जो उच्च न्यायालय उपयुक्त मानते हैं। हालाँकि, यूपी राज्य में, कोई मजिस्ट्रेट अदालतें नहीं सौंपी गई थीं, लेकिन ऐसे मामले सत्र और अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों की विशेष अदालतों को सौंपे गए थे। इस कदम ने सपा नेता आजम खान को प्रभावित

क्या एक समय पर कोई किसी व्यक्ति का ऐटोर्नी और अधिवक्ता हो सकता है। what anyone can be an advocate and attorney of a person at same time

दिल्ली उच्च न्यायालय ने देखा है कि वकीलों द्वारा मुवक्किलों की पावर ऑफ अटॉर्नी रखने और उनके वकील के रूप में कार्य करने की प्रथा अधिवक्ता अधिनियम 1961 के प्रावधानों के विरुद्ध है। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह की पीठ ने कहा कि निचली अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा न हो और रजिस्ट्री को निचली अदालतों में आदेशों की प्रति प्रसारित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने एक ही संपत्ति से जुड़े तीन अलग-अलग मुकदमों की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अमरजीत सैनी के पास एक वादी की पावर ऑफ अटॉर्नी थी और वह उनके वकील के रूप में भी कार्य कर रहा था और क्या कानून के तहत ऐसी व्यवस्था की अनुमति है? अदालत के समक्ष, सैनी ने प्रस्तुत किया कि वह अपना वकालतनामा वापस ले लेंगे और वकील के रूप में वादी का प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे। वकील ने कोर्ट को यह भी बताया कि दोनों पक्षों के बीच विवाद को सेटलमेंट डीड के जरिए सुलझा लिया गया है। सबमिशन सुनने के बाद, बेंच ने कहा कि मामले में आगे के आदेश पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है और पक्षों को 28/01/2022 को ट्रायल कोर्ट के सम

किशोर द्वारा किए गए अपराध में अभियुक्त की उम्र का निर्धारण कैसे करें। how determined the age of juvenile

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ऋषिपाल सिंह सोलंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य मामले में किशोर न्याय अधिनियम 2015 के तहत किशोर दावों के निर्धारण से संबंधित सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत किया। एक आपराधिक मामले में एक आरोपी की उम्र के निर्धारण को चुनौती देने की याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ ने ये फैसला सुनाया उदाहरणों से लिए गए सिद्धांत और न्यायमूर्ति नागरत्ना द्वारा लिखे गए निर्णय में संक्षेप इस प्रकार हैं: (i) किशोर होने का दावा आपराधिक कार्यवाही के किसी भी स्तर पर किया जा सकता है, जिसमें मामले का निर्णय होने के बाद भी शामिल है।  किशोर होने का दावा दायर करने में देरी का उपयोग दावे को अस्वीकार करने के लिए नहीं किया जा सकता है। इसे पहली बार सप्रीम कोर्ट के समक्ष भी उठाया जा सकता है।  (ii) किशोरावस्था के लिए एक आवेदन न्यायालय या जेजे बोर्ड के पास दायर किया जा सकता है।  (ii) जब किसी व्यक्ति को समिति या जेजे बोर्ड के समक्ष लाया जाता है, तो जेजे अधिनियम, 2015 की धारा 94 लागू होती है।  (ii) यदि किशोरता के लिए आवेदन न्यायालय के स

क्या अभियुक्त आत्मसमर्पण करने के बाद भी अग्रिम जमानत याचिका दायर कर सकता है।

आत्मसमर्पण या नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का विकल्प अग्रिम ज़मानत ख़ारिज करने का आधार नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट। मंगलवार को, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि सिर्फ इसलिए कि पार्टियों के लिए आत्मसमर्पण करने और चार्जशीट दाखिल करने के बाद नियमित जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए छूट है, यह आरोप पत्र दाखिल होने के बाद सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने से रोकने का आधार नहीं हो सकता। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अब यह मत व्यक्त किया है कि आत्मसमर्पण करने के बाद भी अभियुक्त अग्रिम जमानत याचिका दायर कर सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने यह टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था और कहा था कि याचिकाकर्ता दूसरी जमानत याचिका दायर नहीं कर सकता है और शीर्ष अदालत के निर्देशों के अनुसार, उन्हें आत्मसमर्पण करना होगा और फिर नियमित जमानत के लिए आवेदन करना होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्याया

why permit to loudspeaker on mosque

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार और पुलिस से पूछा कि कानून के किन प्रावधानों के तहत 16 मस्जिदों को लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के उपयोग की अनुमति दी गई है और इस तरह के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए ध्वनि प्रदूषण नियम के तहत क्या कार्रवाई की जा रही है। चीफ ज‌स्टिस रितु राज अवस्थी और जस्टिस सचिन शंकर मखदूम ने आदेश में कहा, "प्रतिवादी राज्य के अधिकारियों को यह बताना होगा कि कानून के किन प्रावधानों के तहत, लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के उपयोग को प्रतिवादियों ने 10 से 26 मस्जिदों में उपयोग की अनुमति दी है और उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 के अनुसार क्या कार्रवाई की जा रही है।" याचिकाकर्ता राकेश पी और अन्य की ओर से पेश अधिवक्ता श्रीधर प्रभु ने कहा कि 2000 के नियमों के नियम 5 (3) के तहत लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के उपयोग की अनुमति स्थायी रूप से नहीं दी जा सकती है। नियम 5(3) के तहत लाउड स्पीकर/पब्लिक एड्रेस सिस्टम (और ध्वनि उत्पन्न करने वाले उपकरणों) के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया है। यह राज्य सरकार क

शराब की बू आने का मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति नशे में था', केरल उच्च न्यायालय का फैसला

केरल हाईकोर्ट ने कहा, 'निजी स्थानों पर शराब का सेवन करना तब तक अपराध नहीं है, जब तक इससे जनता को कोई परेशानी न हो. कोर्ट ने ये भी कहा कि शराब की बू का मतलब यह नहीं कि वो शख्स नशे में है।  केरल उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया कि निजी स्थान पर शराब का सेवन तब तक अपराध नहीं है जब तक कि वे जनता में कोई उपद्रव नहीं करते हैं।  याचिकाकर्ता के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द करते हुए, जस्टिस सोफी थॉमस ने टिप्पणी की:  "किसी को भी परेशान या परेशान किए बिना निजी स्थान पर शराब का सेवन करना कोई अपराध नहीं होगा। केवल शराब की गंध का मतलब यह नहीं लगाया जा सकता है कि वह व्यक्ति नशे में था या किसी शराब के प्रभाव में था।"  याचिकाकर्ता पर केरल पुलिस अधिनियम की धारा 118 (ए) के तहत एक आरोपी की पहचान करने के लिए बुलाए जाने पर एक पुलिस स्टेशन के समक्ष कथित तौर पर शराब के नशे में पेश होने के लिए मामला दर्ज किया गया था।  अधिवक्ता आई.वी.  प्रमोद, के.वी.  याचिकाकर्ता की ओर से पेश शशिधरन और सायरा सौरज ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता एक ग्राम सहायक है और उसे शाम 7:00 बजे स्टेशन पर बुलाया गया था।  

How fixed the capacity of child witness /बाल साक्षी की क्षमता का निर्धारण कैसे हो?

बाल  स क्षी कौन है ?      बाल साक्षी वह व्यक्ति है जिसकी आयु 16 वर्ष की पूरी नहीं हुई है। कभी -2 ऐसी परिस्थिति में अपराध कारित किया जाता है कि उस घटना का कोई व्यस्क व्यक्ति साक्षी उपलब्ध नहीं होता। और घटना स्थल पर केवल बाल साक्षी की उपलब्धता ही प्राप्त होती है तो वहाँ बाल साक्षी का साक्ष्य महत्वपूर्ण हो जाता है।         अभी माननीय उच्चतम न्यायलय के समक्ष एक हत्या का मामला पी रमेश बनाम राज् य प्रसतुत हुआ जिसमे अभियोजन के दो साक्षी आरोपी और मृतिका के नाबालिग बच्चे थे। विचारण न्यायालय ने उनके सबूतों को केवल इस आधार पर दर्ज नहीं किया कि वे उस व्यक्ति की पहचान करने में असमर्थ हैं जिसके सामने वे बयान दे रहे थे। अर्थात वे जज और वकीलों को नहीं जानते थे। यधपि बाल गवाहों ने यह कहा था कि वो अपनी माँ की उन परिस्थितियों में होने वाली मृत्यु के बारे में साक्ष्य देने के लिए आये हैं। विचारण न्यायालय ने अन्य साक्षयों के आधार पर आरोपी को भा दण्ड संहिता की धारा 302/498क के अंतर्गत दोषी ठहराया।     उक्त मामले में माननीय उच्च न्यायलय की राय       उच्च न्यायलय ने आरोपियों की अपील पर निर्णय दिया था कि

प्रोटेस्ट पीटिशन में अपनाई जाने वाली प्रकिया /process followed in protest petition

उच्चतम न्यायलय ने विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सु कोर्ट 2019 के वाद में यह व्यवस्था की है कि प्रोटेस्ट पीटिशन में कौन सी प्रकिया अपनायी जानी चाहिए ?       न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसैफ की खण्ड पीठ ने यह मत व्यक्त किया कि प्रोटेस्ट पीटिशन को परिवाद के रूप में लेना चाहिए। यदि वह एक परिवाद की आवश्यकताऔं को पूर्ण करता है तो मजिस्ट्रेट  दण्ड प्रकिया संहिता की धारा 200 एवं 202 की पालना कर सकता है।      बैंच ने यह भी कहा कि यदि मजिस्ट्रेट प्रोटेस्ट पीटिशन को परिवाद की तरह नहीं लेता तो परिवादी के लिए उपचार होगा कि वह एक नया परिवाद संस्थित करे। और मजिस्ट्रेट से दण्ड संहिता की धारा 200 एवं 202 की पालना करने की अपेक्षा करे।       उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर बहुत से निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्रोटेस्ट पीटिशन दायर करने का संहिता में कोई प्रावधान नहीं है परन्तु यह व्यवहार में है।     प्रोटेस्ट पीटिशन कोन दायर कर सकता है?            भगवन्त सिंह वाद ए आई आर 1985 सु कोर्ट 1285 के अनुसार यह अधिकार केवल सूचनादाता को है अन्य किसी को नहीं

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत उच्च न्यायलय की अंतर्निहित शक्तियां

     इस धारा के अंतर्गत ऐसे मामले आते हैं जिसमे कानून द्वारा न्यायालय के ऊपर यह निर्णय छोड दिया जाता है कि वह अपने विवेक से परिस्थिति के अनुसार निर्णय करे। इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 को कानून में शामिल किया गया है। यहाँ हम यह भी जानेंगे कि इस धारा के अंतर्गत किस प्रकार के मामले आते हैं और वो किन परिस्थितियों में एवं किस प्रकार से निपटाये जायेंगे। इन्ही शक्तियों को हम न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के रूप में जानते हैं।     धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता 1973 - इस संहिता की कोई भी बात उच्च न्यायलय की ऐसे आदेश देने की अंतर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली नहीं समझी जायेगी जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिए या अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्य की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो।     अर्थात इसमें कहा गया है कि उच्च न्यायलय की अंतर्निहित शक्तियों को इस संहिता के किसी प्रावधान से सीमित नहीं किया जा सकता है। यह वो अंतर्निहित शक्तियों हैं जो इस संहिता के अंतर्गत किसी आदेश को प

Weather Allegation Of Fault On His Advocate is Reasonable Cause For Delay condonation -क्या अपने वकील पर उपेक्षा का आरोप लगाना देरी को माँफ करने का उचित कारण है

  इस लेख में मैं माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के माध्यम से यह दर्षित करूंगा कि किसी विधिक मामले में देरी करने का आरोप अधिवक्ता पर लगाकर क्या देरी को माँफ कराया जा सकता है -     माननीय उच्चतम न्यायालय ने सिविल अपील संख्या 50-51/2009 ,एस्टेट आफिसर हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण एवं अन्य बनाम गोपी चन्द, के मामले में दूसरी अपील को 1942 दिन की देरी से दाखिल करने की देरी को माँफ करने से इनकार कर दिया। उक्त मामले में दूसरी अपील 1942 दिन की देरी से दाखिल की गई थी और देरी करने का आरोप अपने वकील पर लगाया गया था।   माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति ए एम सप्रे तथा न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने उक्त याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि उनके वकील ने समय पर उचित कदम नहीं उठाया और अपील देरी से दाखिल की गई, यह कथन 1942 दिन की देरी को माँफ करने का उचित कारण नहीं है।     न्यायालय ने कहा कि हमारी राय में यह अपीलकर्ता (उनके कानूनी प्रबंधकों ) की जिम्मेदारी है कि अपील समय पर दाखिल की जाय। और यदि अपीलकर्ता को लगता है कि उनका वकील मुकदमा में दिलचस्पी नहीं ले रहा है तो उन्हें तुरन्त दूसरे वकील की म

क्या NDPS की धारा 42 का अनुपालन आवश्यक है - Whether compliance of section 42 NDPS act is necessary

    इस भाग में मैं यह वर्णन करूंगा कि जब पुलिस किसी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करती है या उसकी तलाशी लेती है जिसके कब्जे में कोई नशीला पदार्थ अवैध रूप से पाया जाता है तो क्या धारा 42 NDPS का पालन करना अनिवार्य होगा। इस प्रश्न का उत्तर निम्न वाद के निर्णय से प्राप्त होगा -          सुखदेव सिंह  बनाम  पंजाब राज्य     माननीय उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में उक्त वाद में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय के फैसले के खिलाफ सुखदेव सिंह की अपील पर निर्णय दिया है कि धारा 42 का पुलिस द्वारा पालन न किये जाने पर उसे बरी कर दिया गया है। धारा 42 के अन्तर्गत जांच अधिकारी को बगेर किसी वारण्ट या अधिपत्र के ही तलाशी लेने, मादक पदार्थ जब्त करने और गिरफ्तार करने का अधिकार होता है। लेकिन इस धारा में यह भी प्रावधान है कि मादक पदार्थ के बारे मे किसी अधिकारी को यदि गुप्त सूचना मिलती है तो उसे तत्काल अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए ।      इससे पहले इस तरह की सूचना तुरन्त भेजने का प्राविधान था। निर्दोष को झूठा न फसाया जा सके ,इस कारण संसद ने कानून में वर्ष 2001मे बदलाव  किया। इस संशोधन के अनु

भारत में संविदा कैसे होती है /Contract in India

संविदा की परिभाषा -   भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(ज) के अनुसार, विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार संविदा है।    संविदा के आवश्यक तत्व        (1) कोई करार किया गया हो।        (2) करार विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो।   (1)करार -प्रत्येक वचन या वचन का वर्ग जो एक दूसरे के लिए प्रतिफल हो ,करार कहलाता है।   (2) विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार - धारा 10 के अनुसार, वे सभी करार संविदा हैं जो संविदा करने के लिए सक्षम पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति से किसी विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और विधिपूर्ण उद्देश्य से किये गये हैं एवं अभिव्यक्त रूप से शून्य घोषित नहीं किये गये हैं ।    इसलिये मान्य संविदा के लिए निम्नलिखित शर्तें पूर्ण होना आवश्यक है -    (1) पक्षकार सक्षम हों ।    (2) सम्मति स्वतंत्र हो ।    (3) प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्ण हो।     (4) अभिव्यक्त रूप से शून्य न घोषित किये गये हों ।    (5) यदि अपेक्षित हो तो करार लिखित एवं रजिस्टर्ड होना चाहिए।            करार एवं संविदा में अन्तर   1. परिभाषा सम्बन्धी - विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार संविदा हैं जबकि प्रत्येक वचन एवं वचनों का व

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Kanunigyan :- भरण पोषण का अधिकार :