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Court Cannot Issue Process U/S 82 Or 83 CrPC Without Recording Satisfaction That Persons Were Deliberately Avoiding Service: Patna HC Reiterates https://www.livelaw.in/high-court/patna-high-court/patna-high-court-court-proclamation-property-attachment-section-82-83-crpc-

      Patna High Court Ajeet Kumar vs The State Of Bihar on 14 August, 2024 Author: Partha Sarthy Bench: Partha Sarthy           IN THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT PATNA                   CRIMINAL MISCELLANEOUS No.66151 of 2023      Arising Out of PS. Case No.-791 Year-2015 Thana- AURANGABAD COMPLAINT CASE                                       District- Aurangabad      ====================================================== 1.    AJEET KUMAR SON OF VIJAY PRASAD @ PARMESHWAR SINGH 2.   PAPPU KUMAR SON OF VIJAY PRASAD @ PARMESHWR SINGH      BOTH   RESIDENTS      OF    VILLAGE-   NARAYANPUR, P.O.-      KAPSIYAWAN, P.S.- HILSA, DISTRICT- NALANDA             ...

क्या अपराधिक विचारण में दोषमुक्त होने का अनुशासनात्मक कार्यवाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा

 उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया है कि किसी आपराधिक विचारण में दोषमुक्त होने का अनुशासनात्मक कार्यवाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अपराधिक विचारण और अनुशासनात्मक कार्यवाही दोनों मामलों में सबूत के मानक भिन्न भिन्न हैं और कार्यवाही भी भिन्न भिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न उद्देश्यों के लिए संचालित होती है। न्यायमूर्ति एमआर शाह और बीवी नागरत्ना की पीठ ने औद्योगिक अधिकरण द्वारा पारित एक आदेश को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि जिसमें महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम के चालक को बहाल करने का निर्देश दिया गया था जिसकी सेवाओं को अनुशासनात्मक जांच के बाद समाप्त कर दिया गया था। चालक के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी क्योंकि वह जिस बस को चला रहा था, उसकी जीप से टक्कर हो गई, जिससे चार यात्रियों की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई। अधिकरण द्वारा यह पाया गया कि चालक की ओर से लापरवाही की गई थी और उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। अधिकरण ने माना कि आपराधिक मामले में दोषमुक्त होना कर्मचारी के बचाव में नहीं आएगा क्योंकि आपराधिक मामले में बरी होने का कारण जांच अधिकारी, पंच के लिए स्पॉट पंचनामा...

भारत में विवाह का पंजीकरण कैसे कराएं

  विवाह  प्रमाण पत्र  यदि आप विवाह प्रमाण पत्र बनवाना चाहते हैं तो उसके लिए विवाह पंजीकरण करवाना आवश्यक हैं । उसके लिए आपको अपने राज्य की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। इससे समय और धन दोनों की बचत होगी तथा भाग दौड़ से भी बचा जा सकता है। इसके लिए आप ऑफलाइन आवेदन कर सकते  हैं। विवाह पंजीकरण कराने के लिए आपको एक निर्धारित शुल्क  भी अदा करना होगा। यदि आप समय से विवाह पंजीकरण नहीं करवाते हैं तो आपको जुर्माना भी देना पड़ सकता है। यह शास्ति की राशि अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग निर्धारित की गई है। विवाह पंजीकरण का उद्देश्य जैसे कि  सभी लोग जानते हैं कि शादी के बाद कुछ महिलाओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जैसे कि घरेलू हिंसा, बाल विवाह, पति की मृत्यु हो जाने पर पति के रिश्तेदारों द्वारा घर से निकाला जाना आदि। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए भारत सरकार द्वारा विवाह पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है ताकि महिलाओं के साथ होने वाले इस दुर्व्यवहार को रोका जा सके। अब सभी धर्म के नागरिकों को यह पंजीकरण करवाना अनिवार्य है। विवाह पंजीकरण के ल...

राशन डीलर की अनियमितताओं की जांच के लिए शिकायत कैसे करे।

 राशन डीलर राशन वितरण में इसलिए अनियमितता कर पाता है क्योंकि अधिकतर लोग यह नही जानते कि डीलर की शिकायत कहां  और कैसे करें ? लेकिन यदि राशन कार्ड धारक  जागरूक नहीं होगा, तो राशन डीलर राशन वितरण में गड़बड़ी करते रहेंगे। इसलिए हमको यह जानना बहुत आवश्यक है कि राशन डीलर की शिकायत कैसे और कहां करें ? चलिए  इसके बारे में  पूरी जानकारी  बताते है। राशन डीलर की शिकायत कैसे करें ? राशन डीलर की शिकायत करने के लिए सभी राज्यों के खाद्य विभाग ने  हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। आप उस शिकायत नंबर पर फोन करके  राशन डीलर की शिकायत कर सकते है। नीचे तालिका में  राज्य का नाम एवं राशन डीलर का शिकायत नंबर दिया गया है राज्य का नाम-- शिकायत नंबर आंध्रप्रदेश -१८००-४२५-२९७७ अरुणाचल प्रदेश -०३६०२२४४२९० असम -1800-345-3611 बिहार 1800-3456-194 छ्त्तीसगढ़ 1800-233-3663 गोवा -      1800-233-0022 गुजरात 1800-233-5500 हरियाणा 1800-180-2087 हिमाचल प्रदेश 1800-180-8026 झारखंड 1800-345-6598, १८००-212-5512 कर्नाटक   १८००-425-1550 मध्यप्रदेश ...

क्या बीमा कंपनी बीमाधारक द्वारा बताई वर्तमान चिकित्सा स्थिति का हवाला देकर दावा को खारिज कर सकती है।

 उच्चतम न्यायालय ने बीमा धारकों के पक्ष में एक बड़ा फैसला किया है। अब बीमा कंपनी बीमाधारक द्वारा बताई वर्तमान चिकित्सा स्थिति का हवाला देकर दावा को खारिज नहीं कर सकती। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बैंच ने कहा कि प्रस्तावक का कर्तव्य है कि वह बीमाकर्ता को दी जाने वाली जानकारी में सभी महत्वपू्र्ण तथ्यों का उल्लेख करें। यह माना जाता है कि प्रस्तावक बीमा से जुड़ी सभी जानकारी को जानता है। बैंच ने कहा, 'हालांकि वह जो जानकारी देता है, वह उसके वास्तविक ज्ञान तक सीमित नहीं है।' यह उन भौतिक तथ्यों तक है, जो कार्य की सामान्य प्रक्रिया में उसे जानना चाहिए। न्यायालय ने आगे कहा कि एक बार बीमाधारक की मेडिकल स्थिति का आकलन करने के बाद पॉलिसी जारी हो जाए, तो बीमाकर्ता उस मौजूदा चिकिस्ता स्थिति का हवाला देकर दावा खारिज नहीं कर सकता जिसे बीमाधारक ने प्रस्ताव फॉर्म में बताया था।  सर्वोच्च न्यायालय मनमोहन नंदा द्वारा राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के आदेश के विरुद्ध संस्थित अपील पर सुनवाई कर रहा था। दरअसल यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने यूएस में इलाज के खर्चे का नंदा का दावा खारिज कर दिया थ...

क्या किराएदार किसी भवन का स्वामी बन सकता है और किरायानामा 11 महीने ही क्यों बनाया जाता है

 किराया अनुबंध और किरायानामा के लिए क्या क्या कार्य आवश्यक होते हैं यह जानकारी प्राप्त करना बहुत जरूरी होता है ताकि भविष्य में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। तो आओ जानते हैं उन सभी आवश्यक बातों को। जो कि निम्न प्रकार हैं-  अनुबंध और किराए की रसीद आवश्यक है किराएदारी के मामलों  में अक्सर यह देखा गया है कि किराया एग्रीमेंट और किराए की रसीद के सम्बन्ध में मकान स्वामी और किराएदार सतर्क नहीं होते हैं। भवन स्वामी भी अपना किरायानामा बनवाने में चूक करते है और किराएदार भी इस पर बल नहीं देते हैं जबकि यह बहुत घातक हो सकता है। किसी भी संपत्ति को किराए पर देने  पूर्व उसका किरायानामा निष्पादित किया जाना चाहिए और हर महीने के किराए की वसूली की  भवन स्वामी द्वारा किराएदार को किराया प्राप्ति की रसीद देना चाहिए । ऐसा करने से  सबूत भविष्य के लिए उपलब्ध रहते हैं। और इससे  भविष्य में यह साबित किया जा सकता है कि जो व्यक्ति भवन पर अपना कब्जा बना कर बैठा है वह भवन पर एक किराएदार की हैसियत से है। यदि ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो तो भवन पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति यह भी क्ल...
 क्या  मुस्लिम लड़की 18 वर्ष से कम आयु में अपनी मर्ज़ी से शादी कर सकती है पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पुलिस को एक 17 वर्षीय मुस्लिम लड़की की सुरक्षा देने का आदेश दिया है, जिसने अपने परिवार और रिश्तेदारों की इच्छा के विरुद्ध एक हिंदू लड़के से शादी की थी। अपने आदेश में न्यायालय ने कहा कि क्योंकि वह एक मुस्लिम लड़की है वह युवावस्था में पहुंचने के बाद किसी से भी शादी करने के लिए स्वतंत्र थी, जिसका अर्थ है कि देश के कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम शादी की उम्र मुसलमानों पर लागू नहीं होती है। न्यायालय ने कहा कि परिवार को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति हरनरेश सिंह गिल ने कहा, “कानून स्पष्ट है कि मुस्लिम लड़की की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा शासित होती है।” सर दिनशाह फरदुनजी मुल्ला द्वारा ‘मोहम्मडन कानून के सिद्धांत’ पुस्तक के अनुच्छेद 195 के अनुसार , मुस्लिम लड़की याची संख्या 1, 17 वर्ष की आयु में, अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह अनुबंध में प्रवेश करने के लिए सक्षम है। उसके साथी की उम्र 33 साल के आसपास बताई जा रही है। नतीजतन, याचिकाकर्ता नंबर 1 मुस्लिम पर्स...

मानसिक बीमारी के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने पति को तलाक की डिक्री प्रदान की

दिल्ली उच्च न्यायालय ने १६ वर्ष पुराने एक विवाह को विच्छेदित करते हुए निर्णय दिया कि मानसिक रूप से अस्वस्थ जीवनसाथी के साथ रहना आसान नहीं है, क्योंकि इसमें पत्नी ने यह तथ्य छुपाया था कि वह सिजोफ्रेनिया से पीड़ित थी। जस्टिस विपिन सांघी और जसमीत सिंह की पीठ ने पति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि विवाह केवल सुखद यादों और अच्छे समय से नहीं बनता है, विवाह में दो व्यक्तियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं और एक साथ परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे साथी के साथ रहना आसान नहीं है, जो मानसिक रूप से अस्वास्थ्य  हो, इस तरह की समस्याओं का सामना करने वाले व्यक्ति के लिए अपनी अलग चुनौतियां होती हैं, और इससे भी अधिक उसके जीवनसाथी के लिए। विवाह में समस्याओं और भागीदारों के बीच संचार की समझ होनी चाहिए, विशेषकर जब विवाह में दो पक्षों में से एक ऐसी चुनौतियों का सामना कर रहा हो।   न्यायालय ने पत्नी द्वारा विवाह से पूर्व अपनी मानसिक बीमारी का खुलासा नहीं करने पर कहा कि यह याची के साथ एक धोखाधड़ी थी। कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने कभी भी पति को अपनी मानसिक बीमारी के बारे में नह...

क्या दहेज उत्पीड़न के मामले मे पति के परिवार के सदस्यों को आरोपी बनाया जा सकता है।

 दहेज उत्पीड़न के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने एक महिला और एक पुरुष के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवादों में बार-बार पति के परिवार के सदस्यों को प्रथम सूचना रिपोर्ट में यूं ही घसीटकर आरोपित बनाया जा रहा है।जोकि गलत है।     जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी और जस्टिस हृषिकेश राय की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें दहेज हत्या के मामले में आरोपित मृतका के देवर और सास को समर्पण करने और जमानत के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया गया था।    शीर्ष न्यायालय ने कहा कि बड़ी संख्या में परिवार के सदस्यों को प्राथिमिकी में यूं ही नामों का उल्लेख करके प्रदर्शित किया गया है, जबकि विषय-वस्तु अपराध में उनकी सक्रिय भागीदारी को उजागर नहीं करती, इसलिए उनके खिलाफ मामले का संज्ञान लेना उचित नहीं था। यह भी कहा गया है कि इस तरह के मामलों में संज्ञान लेने से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि मृतका के पिता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत का अवलोकन करने से आरोपित की संलिप्तता को उजागर करने वाले किसी ...

किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी कब आवश्यक है

   इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रूटीन गिरफ्तारी को लेकर अहम निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि विवेचना के लिए पुलिस कस्टडी में पूछताछ के लिए जरूरी होने पर ही गिरफ्तारी की जाए। कोर्ट ने कहा है कि गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होना चाहिए. गैरजरूरी गिरफ्तारी मानवाधिकार का हनन है। जोगिंदर सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि रूटीन गिरफ्तारी पुलिस में भ्रष्टाचार का स्रोत है। रिपोर्ट कहती है 60 फीसदी गिरफ्तारी गैरजरूरी और अनुचित होती है। जिस पर43.2 फीसदी जेल संसाधनों का खर्च हो जाता है।    उच्च न्यायालय ने कहा कि वैयक्तिक स्वतंत्रता बहुत ही महत्वपूर्ण मूल अधिकार है। बहुत जरूरी होने पर ही इसमें कटौती की जा सकती है। गिरफ्तारी से व्यक्ति के सम्मान को ठेस पहुंचती है। इसलिए अनावश्यक गिरफ्तारी से बचना चाहिए। कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न, मारपीट गाली-गलौज करने के आरोपी राहुल गांधी की अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है। कोर्ट ने कहा है कि गिरफ्तारी के समय 50 हजार के मुचलके व दो प्रतिभूति लेकर जमानत पर रिहा कर दिया जाए। यह आदेश जस्टिस अजीत सिंह के एकल पी...

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 397 के अंतर्गत अपराध के आवश्यक तत्व क्या है

शिकायतकर्ता की शिकायत दर्ज करने और जांच पूरी होने पर, पुलिस ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 392/397 और मध्य प्रदेश डकैती और व्यापार प्रभाव क्षेत्र अधिनियम १९८१  की धारा 11/13 के अंतर्गत आरोप पत्र दाखिल किया।           26 फरवरी, 2013 को विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता और छोटू के खिलाफ आईपीसी की धारा 392/397 और एमपीडीवीपीके अधिनियम, 1981 की धारा 11/13 के अंतर्गत आरोप तय किए। सबूतों का विश्लेषण करने पर, विचारण न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता और उसके सह-आरोपी घटना में लिप्त थे और आरोप को साबित किया गया है। तदनुसार सजा और दोषसिद्धि करार दे दी।      विचारण न्यायालय के फैसले का विरोध करते हुए, अपीलकर्ता और सह-आरोपी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि उनके खिलाफ मामले में झूठा आरोप लगाया गया था और आईपीसी की धारा ३९७ के अंतर्गत आरोप कायम नहीं रखा जा सकता है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि आग्नेयास्त्र भले ही साबित हो गया हो, लेकिन इसका प्रयोग नहीं किया गया था और इस तरह धारा 397 आईपीसी के अंतर्गत आरोप तय नहीं होगा। सबूतों की विस्तार से ...

क्या पुलिस सात वर्ष तक सजा के मामले मे मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तार कर सकती है। can police arrest on registration of case in seven years imprisonment cases

लाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में यह निर्णय दिया है कि जब तक पुलिस जांच अधिकारी इस बात से संतुष्ट नहीं होते कि किसी मामले के आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक है, तब तक उसकी गिरफ्तारी न की जाए।          न्यायालय ने कहा कि पुलिस मुकदमा दर्ज होते ही आरोपी की सामान्य तरीके से गिरफ्तारी न करे। किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी तभी की जाए, जब मामला सीआरपीसी की धारा 41ए के मानकों पर खरा उतरता हो।     न्यायालय ने कहा कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पूर्व उसकी गिरफ्तारी को लेकर एक चेक लिस्ट तैयार करें और उसमें गिरफ्तारी के कारण का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाए। पुलिस अधिकारी को यह स्पष्ट रूप से कथन करना होगा कि मामले में अभियुक्त की गिरफ्तारी क्यों आवश्यक है। साथ ही मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट का अवलोकन करें और उस पर अपनी सन्तुष्ट होने के बाद ही गिरफ्तारी के आदेश को आगे बढ़ाएं।      यह आदेश न्यायमूर्ति डॉ के जे ठाकर एवं न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की खंडपीठ ने  विमल कुमार एवं तीन अन्य की याचिका पर सुनवा...

दहेज मृत्यु के अपराध को गठित करने के आवश्यक तत्व क्या है। what are necessary ingredients of dowry death offence

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला सुनाया है कि एक बार अभियोजन यह साबित करने में सक्षम हो जाता है कि एक महिला को उसकी मृत्यु से कुछ समय पूर्व दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था, तो न्यायालय इस अनुमान के साथ आगे बढ़ेगा कि दहेज के लिए महिला को प्रताड़ित  करने वाले लोगों ने धारा 304बी के अंतर्गत दहेज मृत्यु का अपराध किया है। मुख्य न्यायाधीश रमना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने आरोपी मृतक की सास और पति द्वारा संस्थित अपील की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की, जिन्होंने झारखंड उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। इस मामले में मृतका के ससुराल पक्ष और पति ने कथित तौर पर दहेज के लिए मृतका को प्रताड़ित किया और उसके लापता होने के बाद पास की एक नदी से एक कंकाल मिला और आरोपियों पर दहेज हत्या का भी आरोप लगाया गया। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा 1999 में पारित दोषसिद्धि के आदेश की पुष्टि की थी, जो कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गिरिडीह, द्वारा पारित आईपीसी की धारा 304 बी, २०1, डीपी एक्ट की धारा 3/4 के अंतर्गत पारित किया गया था। इससे क्षुब्ध होकर आरोपी ने सर्वोच्च न्य...

क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए विवाह योग्य उम्र होना आवश्यक है।

   लिव-इन रिलेशनशिप में एक युवा जोड़े की सुरक्षा की माँग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मंगलवार को फैसला दिया है कि यह तथ्य कि वयस्क लड़का विवाह योग्य उम्र का नहीं है, युवा जोड़े को अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं करता है।    न्यायमूर्ति हरनरेश सिंह गिल संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें याचिकाकर्ताओं ने अपने माता-पिता से पुलिस सुरक्षा की मांग की, जिन्होंने उनके लिव-इन रिलेशनशिप पर आपत्ति जताई थी।   याचिकाकर्ता नंबर २ लड़का बालिग होने के बावजूद अभी विवाह योग्य उम्र तक नहीं पहुंचा था, जिस कारण दंपति के माता-पिता ने उन्हें धमकी दी थी।     उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, गुरदासपुर को निर्देश दिया कि यदि जीवन या स्वतंत्रता के लिए कोई खतरा महसूस होता है तो दंपति को सुरक्षा प्रदान करें।             याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता लगातार खतरे में हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनके माता-पिता उनकी धमकि...

जाली जाति प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त नियुक्ति को रद्द करना उचित है

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा एक महिला सरकारी शिक्षक की सेवा समाप्त करने के आदेश को बरकरार रखा, जिसने अपनी नियुक्ति के लिए जाली जाति प्रमाण पत्र  जमा किया था। यह देखते हुए कि अपने आवेदन में, एक महिला सरकारी शिक्षक ने अपनी जाति को 'अंसारी' बताया था, लेकिन उसने नियुक्ति हासिल करते समय अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित जाति प्रमाण पत्र जमा कर दिया था, न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने उसके बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा।  क्या था पूरा मामला            याचिकाकर्ता  को नवंबर 1999 में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, हरदोई द्वारा इस शर्त के साथ नियुक्ति दी गई थी कि भविष्य में यदि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई कोई जानकारी या उसके द्वारा प्रस्तुत कोई भी दस्तावेज गलत या जाली पाया जाएगा, तो उसकी सेवाएं तत्काल समाप्त किये जाने योग्य होगी। याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित अपना जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था। तत्पश्चात, हरदोई के जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष एक शिकायत की हुईं जिसमें कथन था कि याचिकाकर्ता एक मुसलमान है और उसक...

वकीलों के विरुद्ध शिकायत के निस्तारण के बारे में उच्चतम न्यायालय ने क्या कहा।

दिनांक 17/12/2021 को, उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्य बार परिषदों को निर्देश दिया कि वे अधिवक्ताओं के विरुद्ध शिकायतों का निपटारा धारा ३५ अधिवक्ता अधिनियम के अंतर्गत एक वर्ष के अन्दर तेजी से करें, जैसा कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 36 बी में वर्णित है।                 न्यायालय ने यह भी कहा कि भारतीय विधिज्ञ परिषद के समक्ष कार्यवाहियों का भी तेजी से निपटारा किया जाना चाहिए।      न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बीवी नगरत्ना की खंडपीठ के अनुसार केवल असाधारण मामलों में ही वैध कारण के आधार पर कार्यवाही बार काउन्सिल ऑफ इंडिया को हस्तांतरित की जा सकती है।                   उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पिछले 5 वर्षों में 1273 शिकायतें बीसीआई को हस्तांतरित की गई हैं, इसलिए ऐसी शिकायतों के निपटान के लिए एक तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। उपर्युक्त निर्देशों/टिप्पणियों के अलावा, बेंच ने निम्नलिखित निर्देश भी जारी किए:-     बार काउन्सिल ऑफ इंडिया को शिकायतों को देखने के लिए सेवानिवृत्त न्यायिक अध...

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प्रोटेस्ट पीटिशन में अपनाई जाने वाली प्रकिया /process followed in protest petition

सत्र न्यायालय को न्यायिक दिमाग के आवेदन के बिना छोटे मुद्दों पर जमानत आवेदनों को खारिज नहीं करना चाहिए: इलाहाबाद उच्च न्यायालय